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छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के संस्थापक अमित बघेल की बढ़ी मुश्किलें, कभी भी हो सकती है गिरफ्तारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'अपनी जुबान पर लगाम रखें, कोई राहत नहीं दी जा सकती, अमित बघेल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

NNH रायपुर/ भाजपा के पितृपुरुषो और सिंधी समाज, अग्रवाल समाज के आराध्य देव के लिए आपत्ति जनक टिप्पणी करने के बाद छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के संस्थापक और जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के प्रमुख अमित बघेल के खिलाफ रायपुर सहित देशभर में विरोध प्रदर्शन किया गया था और अलग अलग राज्यों में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। और इसी मामले में अमित बघेल ने जमानत याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान अमित बघेल को जमकर फटकार लगाई है, और याचिका को खारिज कर साफ टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि अपनी जुबान पर लगाम रखें, वहीं जहां-जहां एफआईआर दर्ज हुई है, वहां की सभी कानूनी प्रक्रिया का अमित बघेल को सामना करना होगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।

अब जोहर पार्टी के अध्यक्ष अमित बघेल की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही है। अमित पिछले 27 दिनों से फरार चल रहे हैं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी, जिसे खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि इस मामले में अदालत किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी। कोर्ट आगे ने कहा, पूरे देश की सैर का आनंद लीजिए, अलग-अलग राज्यों में पुलिस उन्हें ले जाएगी। अमित बघेल पर लगभग 12 राज्यों में एफआईआर दर्ज है। और प्राप्त जानकारी के अनुसार एफआईआर दर्ज होने के बाद अमित बघेल को महाराष्ट्र पुलिस गिरफ्तार करने रायपुर आई थी, जिसकी भनक लगते ही अमित बघेल फरार हैं। जिसके बाद राज्य सरकार व पुलिस प्रशासन पर सिंधी समाज और अग्रवाल समाज की ओर अमित गिरफ्तारी का दबाव बढ़ने पर अमित बघेल को भगोड़ा घोषित कर उसपर पांच हजार का इनाम रखा है। अब सुप्रीम कोर्ट में उसकी जमानत याचिका खारिज होने के बाद कभी गिरफ्तारी हो सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान बघेल की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट ने कहा कि, ये बयान स्वीकार्य नहीं थे, लेकिन अमित बघेल ने गुस्से में यह बयान दिया था। और किसी की भावनाएं आहत करने का इरादा नहीं था। उन्होंने यह भी कहा, छत्तीसगढ में पांच एफआईआर दर्ज हैं, इसलिए अन्य राज्यों के मामले वहीं ट्रांसफर कर दिए जाएं। लेकिन इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया, और कहा कि इस मामले में वह किसी भी तरह का कोई जी हस्तक्षेप नहीं करेंगे, और आरोपी को दर्ज एफआईआर के तहत हर राज्य में कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा।

याचिकाकर्ता की ओर से देश भर में हुई एफआईआर को चुनौती देते हुए कहा गया कि,उसने ऐसी टिप्पणी नहीं की है जैसे कि एफआईआर दर्ज किए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अर्नब गोस्वामी मामले का हवाला दिया गया, जिसमें उनके खिलाफ कई एफआईआर की गई थीं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता रवि शर्मा ने प्रतिरोध किया और कहा -“जिस अर्नब गोस्वामी प्रकरण का संदर्भ है वह मामला IPC/CRPC का था। याचिकाकर्ता का यह मामला BNS/BNSS से संबंधित है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 यह कहती है कि, यदि एक मामले में कई एफआईआर हैं तो जांच सबकी होगी और जो चार्जशीट सबसे पहले जिस कोर्ट में पेश होगी वहां अन्य चार्जशीट भी आ जाएगी।इसलिए अर्नब गोस्वामी के न्याय दृष्टांत का लाभ नहीं मिल सकता।यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, इसे खारिज किया जाना चाहिए।” सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और साथ ही कहा – “ज़ुबान पर लगाम रखना चाहिए था,कोई रिलीफ नहीं।”

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