उत्सवविचार/लेख

प्रेसक्लब रायपुर की होली; रंग, रस और रसिकता

गोकुल सोनी, सीनियर फ़ोटो जॉर्नलिस्ट

साथियों, होली तो हर जगह मनायी जाती है, पर जो रंग हमारे प्रेस क्लब में घुलता है, वह सिर्फ गुलाल का नहीं, रिश्तों, ठिठोली और बेबाकी का रंग होता है। 1981 से इस परंपरा को अपनी आंखों से मैं खुद देख रहा हूं। उस दौर में वरिष्ठ और कनिष्ठ पत्रकारों के बीच एक मर्यादित दूरी रहती थी। होली भी उसी अनुशासन में सिमटी रहती। बड़ों के माथे पर आदर से गुलाल, बस।

लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, वैसे-वैसे रंगों की पिचकारी भी खुलती गई। प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने फाग गायकों की मंडलियां बुलानी शुरू की। ढोलक बजी, मंजीरा खनका, नंगाड़ा बजे और फिर भंग के साथ रंग ऐसा जमा कि संकोच भी रंग में घुल गया।

धीरे-धीरे बड़े-बड़े नेता भी इस रंगोत्सव के नियमित पात्र बन गए। जो नेता सामान्य दिनों में गंभीरता की मूर्ति लगते थे, वे होली के दिन “मन की बात” खुलकर कह जाते। श्यामाचरण शुक्ल जी और विद्याचरण शुक्ल जी जैसे दिग्गज इस दिन ऐसी बातें कह देते, जिन्हें सुनकर पत्रकार भी हैरान और आनंदित हो जाते। और फिर आते थे सत्यनारायण शर्मा जी हास्य और दोअर्थी संवादों के बेताज बादशाह। उनके संवादों पर ऐसा ठहाका गूंजता कि दीवारें भी मुस्कुरा उठें।

यहां स्वागत भी अनोखा होता है। फूल-मालाओं से नहीं, सब्जियों से। किसी के हाथ में भटा (बैंगन), किसी को मूली, तो किसी को लौकी थमा दी जाती। यह सम्मान कम, संकेत ज्यादा होता है । इसी बीज सामने बैठे लोगों से आवाज आती है- इन्हे पपीता दो……पपीता।

डॉ. रमन सिंह भी इस रंगमंच के सधे हुए कलाकार थे। और जब सामने हों बृजमोहन अग्रवाल जी, तो फिर संवादों की पिचकारी चलनी ही है। एक बार रमन सिंह जी ने चुटकी ली—“बृजमोहन जी के इतने सारे डॉक्टर मित्र हैं, फिर डॉक्टर सलीम राज को ही क्यों साथ रखते हैं ? ठहाकों की बौछार शुरू। बृजमोहन जी भी कहां पीछे रहने वाले थे—डॉक्टर राज सबका राज जानते हैं, ज्यादा बोलोगे तो आपका भी खोल देंगे। …और फिर रंग से ज्यादा शब्द उड़ने लगे।

पूर्व महापौर प्रमोद दुबे की मिमिक्री तो होली की स्थायी आकर्षण रही। वे विद्याचरण शुक्ल की हूबहू नकल उनके सामने ही कर देते। फोन पर दिए गए निर्देशों से लेकर खास अंदाज़ तक। और “विद्या भैया” मुस्कुराते रहते, जैसे कह रहे हों, अरे, आज तो होली है। उनकी कमी तो खलेगी ही।

एक बार छत्तीसगढ़ के संत पवन दीवान जी से फाग गाने की फरमाइश हुई। वे जब ठेठ छत्तीसगढ़ी अंदाज़ में गाने लगे, तो रमन सिंह जी खुद को रोक नहीं पाए और नगाड़ा संभाल लिये। मुख्यमंत्री नगाड़ा बजा रहे हों और पत्रकार ताल दे रहे हों ऐसा दृश्य केवल प्रेस क्लब की होली में ही संभव है।

एक वर्ष होली के अवसर पर सचिदानंद जी उपासने मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हुए। उनका आदर-सत्कार कुछ ज्यादा ही होने लगा। कुछ ऐसा हुआ मानो रंगों के साथ-साथ आदर की बाल्टियां भी उन पर उड़ेल दी गई हों, तभी पीछे से किसी शरारती स्वर ने फुसफुसाहट को सार्वजनिक कर दिया—
अरे भई, ‘माल’ तो इन्होंने ही दिया है।

दरअसल उस समय उपासने जी वेबरेज कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष थे, और प्रेस क्लब की होली में जो विशेष “प्रसाद” वितरित होता है, उसकी व्यवस्था भी उन्हीं की ओर से हुई थी। बस फिर क्या था, सम्मान के रंग और गहरे हो गए। होली का त्योहार है ही ऐसा यहाँ रंगों से ज्यादा रिश्तों की परतें खुलती हैं। कोई गुलाल से रंगता है, तो कोई उदारता से। और कभी-कभी आदर-सत्कार की चमक के पीछे कारण भी उतना ही “तरल” होता है।

रायपुर के ए.डी.एम. रहे टोप्पो जी भी कैरम खेलने प्रेसक्ल्ब आते, सभी से उनका मित्र जैसा व्यवहार हो गया था। होली के दिन उनका बच पाना मुश्किल होता। पहले ड्यूटी का हवाला, फिर धीरे-धीरे रंग, और अंततः मित्रों के हाथों “आधिकारिक” रूप से रंगे जाना। कपड़े तक रंगीन इतिहास बन जाते—और टोप्पो जी हंसते हुए सब स्वीकार करते।

और हां, इस दिन निकलने वाला “नानसेंस टाइम्स” तो जैसे होली का विशेष अंक होता है। उसमें जिसका नाम छप जाए, वह खुद को सम्मानित समझता है, चाहे टिप्पणी कितनी भी शरारती क्यों न हो।

दरअसल, प्रेस क्लब की होली सिर्फ रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि रिश्तों को नए सिरे से रंगने का उत्सव है। यहां पद, प्रतिष्ठा, प्रोटोकॉल सब रंग में धुल जाते हैं। बचता है तो बस हंसी, अपनापन और वह यादगार ठहाका, जो अगले साल तक गूंजता रहता है।

यही है हमारे प्रेस क्लब की होली जहां खबरें नहीं, किस्से बनते हैं। बयान नहीं, बिंदास बातें होती हैं; और रंग सिर्फ चेहरे पर नहीं, दिलों पर भी चढ़ता है।

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