
भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री, रायपुर लोकसभा के सांसद बृजमोहन अग्रवाल के निज सहायक मनोज शुक्ला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट कर कार्यकर्ताओं को लेकर उनकी स्थिति पर लम्बा लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है…
राजनीति कभी तपस्या हुआ करती थी। आज जो छत्तीसगढ़ में कुछ पुराने पुराने नेता है उन्होंने ना खूब लाठियां खाई है, धरना प्रदर्शन किया है, गांव गांव शहर शहर घूमे है पार्टियों के रीति नीति पर घुले मिले है तपस्या की ,लोगों को पार्टी से जोड़ा है, तब जाकर इन सबको मान सम्मान मिला है , और वे सब आज भी लोगों के दिलो में स्थान बनाए हुए है।
राजनैतिक दलों मे पहले यह स्थिति थी कि कार्यकर्ता वर्षों तक बिना किसी अपेक्षा के झंडा उठाता था, पोस्टर चिपकाता था, जेल जाता था, लाठी खाता था — क्योंकि उसे विश्वास होता था कि वह किसी विचार, किसी परिवार का हिस्सा है ,
लेकिन आज का दौर कुछ और ही कहानी कहता है। अब कई नेताओं की शब्दावली में “कार्यकर्ता” का अर्थ बदल गया है। चुनाव के समय वही कार्यकर्ता “मेरे परिवार का सदस्य”, “मेरी ताकत”, “मेरी रीढ़” कहलाता है। और चुनाव खत्म होते ही?
रीढ़ को ही भूल जाते हैं।
स्वार्थ है तो कार्यकर्ता के घर तक
काम निकल गया तो घरों के बाहर प्रवास का बोर्ड “नेटवर्क नहीं मिल रहा”। मंच से कहते हैं — “कार्यकर्ता हमारी पूंजी हैं” कार्यकर्ता है तो हम है
लेकिन व्यवहार में पूंजी नहीं, कार्यकर्ता को खपत की वस्तु बना दिया गया है। जब जरूरत हो, उपयोग करो। काम हो जाए तो अगली नए खेप के कार्यकर्ता का इंतजार करो।
चुनाव के समय नेताओं की गाड़ियाँ सीधे कार्यकर्ता के दरवाज़े पर रुकती हैं। दलो के कार्यालय धर्मशाला की तरह खुले रहते है ,पर जीत के बाद वही गाड़ी अब दरवाज़े के सामने से गुजरते हुए शीशा ऊपर कर लेती है।
जिनके घर चाय पी-पीकर रणनीति बनी थी, अब उन्हें गेट पर लिखा मिलता है “प्रवास पर है ” ।
यह कैसी राजनीति है?
जहाँ संबंध “मतदान तक” सीमित हैं।
जहाँ अपनापन “परिणाम घोषित होने तक” वैध है। जहाँ निष्ठा एकतरफा है, और स्मृति चयनात्मक।
आज दलों में नेताओं के यहां पुराने जीवन खपा दिए गए लोगों को पहचान का संकट है ?
इसके विपरीत, जब पुराने नेता सबको पहचानते है , वर्षों पुराने कार्यकर्ताओं के घर पहुँचते हैं, पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, कुशलक्षेम पूछते हैं — तो यह केवल एक मुलाकात नहीं होती, यह संदेश होता है कि राजनीति अभी पूरी तरह व्यवसाय नहीं बनी है।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की।
नेताओं को तय करना होगा —
उन्हें “कार्यकर्ता” चाहिए या “केवल काम करने वाला”? क्योंकि याद रखिए — कार्यकर्ता केवल पोस्टर लगाने वाला हाथ नहीं होता, वह विश्वास का स्तंभ होता है। और जब स्तंभ ही उपेक्षित हो जाए, तो महल चाहे जितना ऊँचा हो, टिकता नहीं।
आज की राजनीति में सबसे बड़ा संकट विपक्ष नहीं होता —
संकट तब होता है जब अपने ही लोग अपने ही कार्यकर्ता प्रवास पर है देखकर खुद को पराया महसूस करने लगें।
यदि संबंध केवल स्वार्थ से बंधे हों,
तो एक बार तो चुनाव जीत सकते हैं,
लेकिन जनता का कार्यकर्ता का दिल नहीं।
और इतिहास गवाह है —
किसी दल के नेता के यहां प्रवास पर है का रोज बोर्ड देख रहे कार्यकर्ता, नहीं पहचाने जाने से दुखी कार्यकर्ता , दिल से टूटे कार्यकर्ता की खामोशी, किसी भी भाषण से अधिक खतरनाक होती है।
(मनोज शुक्ला)







