“छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत Vs छत्तीसगढ़ सिंधी महापंचायत”
वर्चस्ववादियों की आपसी लड़ाई का सीधा नुकसान समाज को ही भोगना पड़ेगा

विजय कुमार जयसिंघानी…
NNH रायपुर/ स्वतंत्रता के बाद से सिंधी समाज ने विस्थापन, आर्थिक पुनर्वास, और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना किया है। भारत के विभाजन के दौरान, पंजाब और बंगाल के विपरीत, सिंध प्रांत को विभाजित नहीं किया गया था, जिससे सिंधी हिंदुओं को अपना पूरा क्षेत्र छोड़कर भारत आना पड़ा। सबसे गहरा प्रभाव सांस्कृतिक और भाषाई स्तर पर पड़ा है।भारत में सिंधी समाज के पास कोई भाषाई राज्य या भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, जैसा कि अन्य समाजों के पास है।
छत्तीसगढ़ राज्य में भाषावाद और क्षेत्रवाद के नाम पर अलगाववाद का जहरीला बीज बोया जा रहा है, जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य में निवासरत सिंधी समाज ही हो रहा है। उसके बाद भी समाज में एकजुटता का अभाव है। समाज के दो धड़े आमने सामने आ गए हैं, और रविवार 7 दिसम्बर को एक धड़े ने रायपुर में जर्नी ऑफ सिंधीस कार्यक्रम आयोजित किया है तो, दूसरे धड़े ने आनन फानन में अपने नव घोषित पदाधिकारियों का पदभार ग्रहण समारोह आयोजित कर दिया है।
छत्तीसगढ़ में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई एक क्षेत्रीय पार्टी के प्रमुख के द्वारा गत माह विभिन्न समाज के आराध्य देव के प्रति आपत्तिजनक व आपमन जनक टिप्पणी की थी, जिसके विरोध स्वरूप वे सिंधी समाज भी सड़क पर आ गया। जबकि एक अन्य समाज के द्वारा भी विरोध किया गया था। लेकिन अपने आराध्य देव के अपमान से आहत सिंधी समाज ने देशभर में विरोध प्रदर्शन किया, जिसके दबाव में ही शासन ने आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले क्षेत्रीय पार्टी के प्रमुख पर एफआईआर दर्ज कर कार्यवाही की है। जिसके बाद सिंधी समाज क्षेत्रवादियों के सीधे निशाने पर आ गया है। ऐसा नही है कि यह पहली बार हुआ है, सिंधी समाज को इससे पहले भी लगातार टारगेट किया जाता रहा है, और पाकिस्तानी सिंधी कहकर अपमानित किया जाता रहा है।
लेकिन ये सब देखकर सुनकर समाज प्रमुखों ने सदैव चुप्पी साधे रखी, और जब भी उसका विरोध हुआ तो पहले समाज के नौजवान पहले सड़क पर उसके बाद मजबूरन समाज प्रमुखों उनके साथ आना पड़ा। लेकिन समाज नेतृत्व करने वाले छत्तीसगढ़ में हमेशा अलग अलग धड़ो में बंटे रहे हैं। इसके पीछे अपना ईगो राजनैतिक मजबूरी एक बड़ी वजह रही है। छत्तीसगढ़ में जिसे समाज की सर्वमान्य संस्था माना जाता है, उसमे वर्षों तक जमे रहे समाज प्रमुखों के लिए समाज में पनपते आक्रोश के बीच चुनाव कराना पड़ा, और समाज ने नए लोगों को अवसर तो दिया। बड़ी उम्मीद और आशा से भरे पदाधिकारी काम कर ही रहे थे कि उसमें भी गुटबाजी की बात सामने आने लगी, जिसके परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत की तरह एक नई संस्था छत्तीसगढ़ सिंधी महापंचायत का गठन कर दिया गया। इसी के साथ समाज को क्षेत्रीय दल की ओर से बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ है, बावजूद इसके समाज के वर्चस्वशाली लोग अभी अलग ही गुटबाजी में लगे रहे। छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत में जिन्हें संरक्षक बनाया गया है, वे वर्तमान परिस्थितियों में संरक्षक की भूमिका में कहीं नजर नही आए। और वरिष्ठता के आधार पर जिन्हें संरक्षक बनाया जाना चाहिए था, उन्होंने अब अपना अलग ही संगठन छत्तीसगढ़ सिंधी महापंचायत बना लिया है। अब सिंधी समाज में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर वाद-प्रतिवाद जारी है।राज्य में जो वर्तमान हालात बने हुए ऐसे समय में समाज के वर्चस्ववादी लोगों को सब भूलकर एकजुटता दिखानी चाहिए थी, लेकिन दो विपरीत पक्षों के बीच होने वाली बहस, तर्क-वितर्क और खंडन-मंडन, जिसमें एक पक्ष किसी बात का समर्थन करता है (वाद) और दूसरा उसका विरोध या खंडन (प्रतिवाद) करता नज़र आ रहा है। पाया जाता है, जिसका उद्देश्य केवल अपनी बात को सही साबित करना हो गया है। समाज के लिए यह विडंबना ही है कि जब समाज को एकजुटता दिखानी चाहिए थी, तब छत्तीसगढ़ सिंधी पंचायत Vs छत्तीसगढ़ सिंधी महापंचायत हो गया है, और इन वर्चस्ववादियों की आपसी लड़ाई का सीधा नुकसान समाज को ही भोगना पड़ेगा।







