उत्सवधर्म/अध्यात्मसामाजिक सरोकार

महालक्ष्मी पर्व: सिंधी समाज की पावन परंपरा

तीज-त्योहार किसी भी धर्म व संस्कृति की पहचान व धरोहर होते हैं। विविधताओं से भरे हमारे देश में विभिन्न संस्कृतियों को मानने वाले लोग सभी त्योहारों को एकजुट होकर मनाते हैं।

यूँ तो श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त दान करने की परंपरा है, पर सिंधी समाज में श्राद्ध पक्ष के आठवें दिन ‘महालक्ष्मी पर्व’ मनाया जाता है। इस दिन धन की देवी माँ लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है।

महालक्ष्मी पर्व से जुड़ी कथा 

हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई किंवदंती होती है। सिंधी समाज द्वारा मनाए जाने वाले महालक्ष्मी पर्व से जुड़ी कथा इस प्रकार है –

एक राजा था, किसी ने उसे पीला धागा दिया, जिसे सिंधी भाषा में *”झगड़ा” या “सगिड़ो”* कहा जाता है। राजा ने वह धागा अपनी रानी को दिया और कहा इसे बाँध लेना। रानी ने उस धागे का अनादर करते हुए फेंक दिया।

उसी धागे को नौकरानी *बानी* ने उठाया और आदर सहित माथे से लगाकर बाँध लिया। रानी ने अनादर किया और बानी ने आदर, इसलिए बानी की किस्मत खुल गई। वह नौकरानी से महारानी बन गई, उसके पास सारे धन-वैभव आ गए।

इधर रानी का भाग्य फूट गया। वह बगीचे में गई तो सारे पेड़-पौधे सूख गए। गाय ने दूध देना बंद कर दिया। नदी किनारे गई तो नदी सूख गई। उस पर हार चुराने का आरोप भी लग गया और राजा ने उसे महल से निकाल दिया।

दुखी रानी भटक रही थी तभी एक साधु को उस पर दया आ गई और वह उसे अपनी कुटिया में ले आए। एक दिन राजा के सेवक ने उसे देखा और राजा को खबर दी। राजा उसे लेने आए तो साधु ने कहा – अभी आप जाइए, मैं स्वयं इसे भेज दूँगा।

साधु ने रानी को *दूध और शक्कर (जिसे सिंधी में ‘अक्खा’ कहते हैं)* दिया और कहा – जाते समय रास्ते में जो-जो मिले उसमें डालती जाना और कभी भी लक्ष्मी जी के सगिड़े का अनादर मत करना।

रानी ने वैसा ही किया। बाग हरा-भरा हो गया, गाय दूध देने लगी, नदी पानी से भर गई और खोया हुआ हार भी मिल गया। इस तरह रानी का भाग्य पुनः जाग उठा।

पूजा विधि और संदेश

इस दिन घर के सभी सदस्यों को ‘सगिड़ा’ पहनाया जाता है। अष्टमी को मीठी पूड़ी पर लपेटकर ब्राह्मण के यहाँ पूजा करके फिर ‘अक्खा’ डालकर दिया जाता है। इस दिन तरह-तरह के मीठे पकवान जैसे सतपुड़ा, सिवइयाँ, मीठे गच, मीठे चावल, खीर आदि बनाकर माँ लक्ष्मी को भोग लगाकर बाँटा जाता है।

महालक्ष्मी पर्व संदेश देता है कि धन का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। जो लक्ष्मी जी का अनादर करता है, लक्ष्मी रूठ कर चली जाती हैं, और जो नम्रता और आदर से उनका आह्वान करता है, उनके यहाँ लक्ष्मी सदा निवास करती हैं।

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