खास खबरदिल्लीसुप्रीम कोर्ट

सीजेआई गवई के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दी तगड़ी दलील

हिंदुओं में दान, ईसाइयों में चैरिटी, ऐसे ही वक्फ, इस्लाम में ये जरूरी नहीं

NNH नई दिल्ली/ सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि संसद द्वारा पारित कानून तब तक संवैधानिक माना जाएगा जब तक ठोस आपत्ति न हो।

केंद्र सरकार ने कोर्ट से आग्रह किया कि सुनवाई को सिर्फ तीन मुद्दों तक सीमित रखा जाए, वक्फ बाय कोर्ट/यूजर/डीड, वक्फ बोर्ड की संरचना, और कलेक्टर की जांच के दौरान वक्फ की स्थिति।

याचिकाकर्ता पक्ष से कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यह धार्मिक अधिकारों का हनन है, और संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। सिब्बल ने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्तियों को छीनने और नियंत्रित करने का रास्ता बनाता है, जिस पर अंतरिम आदेश जरूरी है। उन्होंने बाबरी मस्जिद का जिक्र करते हुए ‘वक्फ बाय यूजर’ की अवधारणा को अहम बताया और कहा कि मस्जिदों में चढ़ावा नहीं, दान से चलती हैं।

वक्फ संशोधन कानून को चुनौती देने के लिए दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई में बुधवार (21 मई, 2025) को केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा, और केंद्र की ओर से कहा कि वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है, लेकिन यह इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि चैरिटी हर धर्म का हिस्सा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कहता है कि किसी के भी लिए यह जरूरी नहीं है।

मंगलवार को याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन ने दलीलें दीं थी। जबकि केंद्र का पक्ष रखने के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए।

मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं की उस आपत्ति पर जवाब दिया, जिसमें कहा गया कि नया वक्फ कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘जब तक मैंने रिसर्च नहीं की थी तब तक मुझे इस्लाम धर्म के इस हिस्से के बारे में नहीं पता था, कि वक्फ इस्लामिक अवधारणा है, लेकिन यह इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि चैरिटी का कॉन्सेप्ट हर धर्म में मौजूद है। ईसाई धर्म में भी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कहता है कि किसी के लिए भी यह जरूरी नहीं है।

तुषार मेहता ने दलील देते हुए कहा कि हिंदुओं में भी दान देने जैसी चीजें हैं और सिख धर्म में भी ऐसा ही है, लेकिन किसी भी धर्म में इसे जरूरी नहीं बताया गया है। एसजी मेहता ने कहा कि अगर मान लें कि मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर लोगों की फाइनेंशियल स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है, और वह वक्फ नहीं कर पाते हैं, तो क्या वह मुस्लिम नहीं होंगे, यह सुप्रीम कोर्ट की ओर से किया गया एक परीक्षण है, ये निर्धारित करने के लिए कि कोई प्रथा आवश्यक धार्मिक प्रथा है या नहीं। उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म में चैरिटी करना जरूरी नहीं है, इसी तरह इस्लाम में वक्फ है।

तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ बाय यूजर मौलिक अधिकार नहीं है, इसे 1954 में कानून द्वारा मान्यता दी गई थी, और उससे पहले बंगाल एक्ट में, उन्होंने एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि अगर कोई अधिकार विधायी नीति के रूप में कानून द्वारा प्रदान किया गया है, तो उसे राज्य द्वारा हमेशा के लिए छीना जा सकता है।

Back to top button