
सोशल मीडिया पर सीजफायर के बीच इंदिरा गांधी को महान बताते हुए नरेंद्र मोदी को कमज़ोर प्रधानमंत्री बताया जा रहा है। मेरा निजी तौर पर मानना है कि इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच तुलना संभव नहीं है क्योंकि दोनों अलग अलग वक्त में अलग अलग राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थिति में भारत के प्रमुख रहे हैं। इंदिरा गांधी का जवाब नहीं था, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन, 1971 के युद्ध से आज के हालात की कोई तुलना नहीं है। यहां सोशल मीडिया पर कई पोस्ट देखते हुए मुझे तीन चार प्वाइंट जरुर याद आए।

पीयूष पांडे, व्यंग्यकार एवं टीवी पत्रकार
2025 -22 अप्रैल को पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने भारत के 26 निर्दोष लोगों की हत्या की, जिसका जवाब भारत ने 7 मई को नौ आतंकी ठिकानों पर हमला कर दिया। यानी करीब 15 दिन बाद।
1971- उस वक्त यानि 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत ने करीब 8 महीने तक तैयारी की। इंदिरा गांधी ने अप्रैल 1971 में सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ से युद्ध के लिए पूछा तो सैम ने साफ कहा:
“मैं युद्ध अभी नहीं लड़ सकता — बारिश शुरू हो रही है, सैनिक तैयार नहीं हैं, पुल टूटे हुए हैं, साजो-सामान की कमी है। अगर आप चाहें तो मैं हार भी सकता हूं, लेकिन जीत के लिए मुझे समय दीजिए।” और फिर दिसंबर 1971 में युद्ध हुआ।
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2025-पाकिस्तान में आतंकवादियों की फौज को सेना और आईएसआई का समर्थन है, और अकसर ये सबूत मिला है कि आतंकवादियों की कायराना करतूतों को सेना और आईएसआई का संरक्षण मिलता है।
1971-उस वक्त जो हालात थे, उसमें पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोग पाकिस्तान सरकार के खिलाफ थे। पाकिस्तान के जुल्मों सितम से परेशान करीब डेढ़ लाख लोगों ने तो मुक्ति वाहिनी बनाई। और इस मुक्ति वाहिनी के हजारों लड़ाकों को भारत ने ट्रेनिंग दी, पैसा दिया, हथियार दिए। असम, मेघालय और त्रिपुरा के सीमावर्ती इलाकों में विशेष शिविरों में ट्रेनिंग का इंतजाम किया गया था। करोड़ों रुपए खर्च किए गए। यानी पाकिस्तान के खिलाफ पाकिस्तान के ही लाखों लोग लड़ रहे थे, जिसे भारत ने पूरी तरह सपोर्ट किया।
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2025-इस बार यानि 2025 में भारत ने किसी युद्ध का ऐलान नहीं किया था। भारत ने सिर्फ 9 आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया और जब पाकिस्तान की सेना ने हमले शुरु किए तो भारत ने जवाब दिया।
1971-उस वक्त भारत ने 8 महीने की तैयारी की और तैयारी युद्ध की ही थी। और जैसे ही 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान का पहला हमला हुआ, भारत ने धुआंधार जवाब देना शुरु कर दिया।
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2025-भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं, और पाकिस्तान के परमाणु बम किसके कब्जे में हैं, ये किसी को नहीं पता। हालांकि, ये पाकिस्तान को भी पता है कि वो परमाणु बम का इस्तेमाल करेगा तो भारत का एक हिस्सा ही खत्म होगा, पाकिस्तान पूरा निपट जाएगा। लेकिन, भारत की डॉक्ट्रीन है कि वो पहले हमला नहीं करेगा।
1971-भारत परमाणु संपन्न देश भले नहीं था लेकिन परमाणु बम बनाने के बिलकुल करीब था। 1974 में परीक्षण कर भी लिया। पाकिस्तान ने इस युद्ध के बाद ही अपनी कोशिशें शुरु कीं।
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2025-भारत और पाकिस्तान के बीच अब युद्ध ट्रेडिशनल स्टाइल से नहीं होगा, क्योंकि नई तकनीक आ चुकी है, और परमाणु संपन्न होने के बावजूद भारत का पलड़ा भारी है। लेकिन ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान के पास मिसाइल,ड्रोन या बाकी साजोसामान नहीं हैं।
1971-उस दौर में युद्ध का अंदाज पारंपरिक था और सैन्य ताकत के मामले मे पाकिस्तान कहीं नहीं ठहरता था। उदाहरण के लिए भारत के पास करीब 9 लाख सैनिक थे तो पाकिस्तान के पास 5 लाख। भारत के पास 700 लड़ाकू विमान थे तो पाकिस्तान के पास 375 विमान। भारत के पास 55 नौसैनिक विमान थे तो पाकिस्तान के पास केवल 20 जहाज थे।
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इस बीच, जीओपॉलिटिकल समीकरण बदल चुके हैं। उस वक्त अमेरिका पाकिस्तान के समर्थन में था, अब वैसे हालात नहीं है। लेकिन, अमेरिका के लिए बाजार बहुत महत्वपूर्ण है, और किसी भी युद्ध की स्थिति में भारत का बाजार प्रभावित होता है। टैरिफ के मामले में भारत का लचीला रुख अमेरिका को पसंद आया है। इसके अलावा, टेस्ला जैसी अमेरिकी कंपनियों आखिरकार भारत में आ रही हैं। इसके अलावा, चीन को सैटल करने के लिए भारत का मजबूत रहना जरुरी है, और युद्ध में उलझते ही भारत की दिक्कतें बढ़ेंगी ही। हालांकि,पाकिस्तान ज्यादा तबाह होगा। लेकिन, फिर वही बात है कि वो पहले से भीख मांग रहा है और वहां बेरोजगारी दर और महंगाई दर आसमान में हैं। कुल मिलाकर हालात अलग हैं। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं कि अगर सीजफायर करना भी था तो इसकी घोषणा नरेंद्र मोदी या शहबाज शरीफ को करनी चाहिए थी, ना कि ट्रंप को। और ट्रंप की एंट्री ने मोदी को कमजोर साबित किया है। लेकिन, इस पूरी कवायद में भारत ने एक जंग जीती है। और वो है सिंधु समझौते का निलंबन। इस समझौते की शर्तों में बदलाव के लिए भारत 2013 में भिड़ा हुआ है लेकिन कामयाबी नहीं मिल रही। पाकिस्तान की गलती ने भारत को वो मौका दे दिया है,जो वो अरसे से खोज रहा है और अब हर हाल में सिंधु समझौते की शर्तों में बदलाव होगा और कुछ साल बाद यही इस चार दिवसीय युद्ध का हासिल कहलाएगा।







